संक्रमण काल से गुजर रही है उत्तर प्रदेश की राजनीति प्रयोगशाला

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AkhileshYadavPTI

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की सरकार चलते हुए आधे से अधिक वक्त बीत चुका है। युवा मुख्यमंत्री की कार्यक्षमता और ऊर्जा को दृष्टिगत रखते हुए प्रदेश की जनता ने समाजवादी पार्टी को अनुमानों के विपरीत बहुमत दिया किन्तु उसका प्रतिफल भी अनुमान के विपरीत ही मिला। राजनीति की प्रयोगशाला कहलाने वाला उत्तर प्रदेश आज तमाम विरोधाभासों तथा नीतिगत ह्रास का शिकार हो गया है।
आज उत्तर प्रदेश राजनीति के संक्रमण काल से गुजर रहा है। वर्तमान परिपेक्ष्य में उत्तर प्रदेश की राजनीति क्या करवट लेगी यह तो भविष्य के गर्भ में है किन्तु परिस्थितियान चीख-चीख कर कह रही है कि उत्तर प्रदेश में अगली सरकार पूर्ण बहुमत की न होकर गठबंधन की बन सकेगी। इसकी मुख्य वजह राज्य और केंद्र सरकार का उम्मीदों पर खरा न उतरना है
एक तरफ जनता महँगाई से त्रस्त है वहीँ इसी तरफ मतों के ध्रुवीकरण का प्रयास अपने चरमोत्कर्ष पर है। इसके लिए प्रदेश को दंगों की आग में ढकेलने में भी कोई गुरेज नहीं है। आम जन की पीड़ा नक्कारखाने में तूती की आवाज साबित हो रहा है। प्रदेश में कानून व व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गयी है। इसके अतिरिक्त राज्यपाल और प्रदेश सरकार का अघोषित युद्ध सर्वविदित है। राजभवन को सरकार द्वारा भेजे गए विधानपरिषद सदस्यों के मनोनयन की सूची वापस कर देने तथा नए नामों का प्रस्ताव भेजने संबंधी राज्यपाल के आदेश के उपरान्त सपा के थिंक टैंक राम गोपाल यादव ने राज्यपाल के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
प्रदेश की राजनीति में दखल रखने वाली प्रमुख पार्टी बसपा के सितारे गर्दिश में है।बहन जी की पार्टी से कैडर वोट भी कट रहा है तथा पुराने नेता-कार्यकर्त्ता भी पार्टी छोड़कर अन्य दलों का दामन थाम रहे है। ज्यादातर बसपाई भाजपा का दामन थाम रहे है। जहाँ एक तरफ भाजपा में लोग शामिल हो रहे है वहीँ दूसरी तरफ भाजपा का अपना वोट बैंक बचाने में पसीना छूट रहा है। केंद्र सरकार की मंहगाई आदि मुद्दों को लेकर हो रही किरकिरी प्रदेश के भाजपाइयों के चहरे पर शिकन लाने के लिए पर्याप्त है।
सबसे बुरी स्थिति से कांग्रेस गुजर रही है। कांग्रेस में जान फूंकने का कोई जरिया न प्रादेशिक नेतृत्व के समझ में आ रहा है और न ही आलाकमान के। सबसे बड़ी बात यह है कि राजनीति की प्रयोगशाला कहे जाने वाले उत्तर प्रदेश की अपनी स्थिति बदतर होती जा रही है। लोग विकल्प की तलाश में है किन्तु विकल्प मिल नही रहा है। ऐसे में पंचायत चुनावो के बाद ही प्रदेश की राजनीतिक दिशा व दशा का अनुमान लग पायेगा। विडम्बना तो यह है कि प्रदेश में न तो प्रतिभाओं की कमी है और न ही विचारकों की किन्तु वर्तमान परिदृश्य इस तरह का प्रतीत हो रहा है जैसे उत्तर प्रदेश अपने मूल स्वभाव के विपरीत दिशाहीन सा हो गया है

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