II Vedas II

| धर्म
vedas

वेदों में क्या है ?
वेदों में कोई कथा नहीं है। वेद में तिनके से लेकर परमेश्वर पर्यंत वह सम्पूर्ण  ज्ञान विद्यमान है, जो मनुष्यों को जीवन में आवश्यक है ।
मैं कौन हूँ ? मुझमें ऐसा क्या है जिसमे “मैं” की भावना है ?
मेरे हाथ, मेरे पैर, मेरा सिर, मेरा शरीर, पर मैं कौन हूँ ?
मैं कहाँ से आया हूँ ? मेरा तन तो यहीं रहेगा, तो मैं कहाँ जाऊंगा, परमात्मा क्या करता है ?
मैं यहाँ क्या करूँ ? मेरा लक्ष्य क्या है ? मुझे यहाँ क्यूँ भेजा गया ?
इन सबका उत्तर तो केवल वेदों में ही मिलेगा | रामायण व भागवत व महाभारत आदि तो ऐतिहासिक घटनाएं है, जिनसे हमे सीख लेनी चाहिए और इन जैसे महापुरुषों के दिखाए सन्मार्ग पर चलना चाहिए ।
हिंदुओं का धर्मग्रंथ क्या है ?
विद्वानों अनुसार ‘वेद’ ही है हिंदुओं के धर्मग्रंथ। वेदों में दुनिया की हर बातें हैं। वेदों में धर्म, योग, विज्ञान, जीवन, समाज और ब्रह्मांड की उत्पत्ति, पालन और संहार का विस्तृत उल्लेख है। वेदों का सार है उपनिषद् और उपनिषदों का सार है गीता। सार का अर्थ होता है संक्षिप्त।

God-Exists

ईश्वर का स्वरूप क्या है?
यजुर्वेद के बत्ती सवें अध्यावय में परमात्मा‍ के वि‍षय में कहा गया है कि‍ अग्नि वही है, आदि‍त्य वही है, वायु, चन्द्र् और शुक्र वही है, जल, प्रजापति‍ और सर्वत्र भी वही है. वह प्रत्यक्ष नहीं देखा जा सकता है. उसकी कोई प्रति‍मा नहीं है (न तस्य प्रति‍मा). उसका नाम ही अत्यीन्त महान है. वह सब दि‍शाओं को व्या‍प्तै कर स्थिय‍त है. स्पाष्टअ है कि‍ वेद के अनुसार ईश्वर की न तो कोई प्रति‍मा या मूर्ति‍ है और न ही उसे प्रत्यहक्ष रूप में देखा जा सकता है. कि‍सी मूर्ति‍ में ईश्वोर के बसने या ईश्वतर का प्रत्यरक्ष दर्शन करने का कथन वेदसम्मेत नहीं है. जिन्होंने वेद पढ़े हैं वे जानते हैं कि प्रकृति, सांसारिक वस्तुएं, मानव और स्वयं को पूजना कितना बड़ा पाप है। पापी हैं वे लोग जो खुद को पूजवाते हैं। ऐसे संत, ऐसे गुरु और ऐसे व्यक्तियों से दूर रहना ही धर्म सम्मत आचरण है।

वेद के प्रकार
ऋग्वेद :वेदों में सर्वप्रथम ऋग्वेद का निर्माण हुआ । यह पद्यात्मक है । यजुर्वेद गद्यमय है और सामवेद गीतात्मक है। ऋग्वेद में मण्डल 10 हैं,1028 सूक्त हैं और 11 हज़ार मन्त्र हैं । इसमें 5 शाखायें हैं – शाकल्प, वास्कल, अश्वलायन, शांखायन, मंडूकायन । ऋग्वेद के दशम मण्डल में औषधि सूक्त हैं। इसके प्रणेता अर्थशास्त्र ऋषि है। इसमें औषधियों की संख्या 125 के लगभग निर्दिष्ट की गई है जो कि 107 स्थानों पर पायी जाती है। औषधि में सोम का विशेष वर्णन है। ऋग्वेद में च्यवनऋषि को पुनः युवा करने का कथानक भी उद्धृत है और औषधियों से रोगों का नाश करना भी समाविष्ट है । इसमें जल चिकित्सा, वायु चिकित्सा, सौर चिकित्सा, मानस चिकित्सा एवं हवन द्वारा चिकित्सा का समावेश है
सामवेद : सामवेद में गेय छंदों की अधिकता है जिनका गान यज्ञों के समय होता था। 1824 मन्त्रों कें इस वेद में 75 मन्त्रों को छोड़कर शेष सब मन्त्र ऋग्वेद से ही संकलित हैं। इस वेद को संगीत शास्त्र का मूल माना जाता है। इसमें सविता, अग्नि और इन्द्र देवताओं का प्राधान्य है। इसमें यज्ञ में गाने के लिये संगीतमय मन्त्र हैं, यह वेद मुख्यतः गन्धर्व लोगो के लिये होता है । इसमें मुख्य 3 शाखायें हैं, 75 ऋचायें हैं और विशेषकर संगीतशास्त्र का समावेश किया गया है ।
यजुर्वेद : इसमें यज्ञ की असल प्रक्रिया के लिये गद्य मन्त्र हैं, यह वेद मुख्यतः क्षत्रियो के लिये होता है । यजुर्वेद के दो भाग हैं –
कृष्ण : वैशम्पायन ऋषि का सम्बन्ध कृष्ण से है । कृष्ण की चार शाखायें है।
शुक्ल : याज्ञवल्क्य ऋषि का सम्बन्ध शुक्ल से है । शुक्ल की दो शाखायें हैं । इसमें 40 अध्याय हैं । यजुर्वेद के एक मन्त्र में ‘ब्रीहिधान्यों’ का वर्णन प्राप्त होता है । इसके अलावा, दिव्य वैद्य एवं कृषि विज्ञान का भी विषय समाहित है ।
अथर्ववेद : इसमें जादू, चमत्कार, आरोग्य, यज्ञ के लिये मन्त्र हैं, यह वेद मुख्यतः व्यापारियों के लिये होता है । इसमें 20 काण्ड हैं । अथर्ववेद में आठ खण्ड आते हैं जिनमें भेषज वेद एवं धातु वेद ये दो नाम स्पष्ट प्राप्त हैं।

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